How to gain control over mind (मन पर नियंत्रण कैसे करें?)

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आचार्यजी , मन और शरीर के बीच में क्या सम्बन्ध है? इसका उपयोग हम अपने भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास में कैसे कर सकते हैं? कोई विशेष विधि बताइये जिससे कि हम अपने मन को नियंत्रित कर सकें|
देखो! योग दर्शन में हमारे मनीषियों ने कहा कि शरीर और मन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं पर पाश्चात्य का वैज्ञानिक इस बात को माने को राज़ी ही नहीं था|  और इसी कारण से करीब करीब पिछले 7 शतकों से हम भारतीय भी अपने वैदिक विज्ञान की ओर आँख बंद किये बैठे रहे | हमने अपने शरीर को एक अलग रूप में देखने की कला विकसित कर ली और इसकी शक्तियों व सामर्थ्य को ही सर्वोपरि मानने की भूल कर बैठे|  हमने अपनी शक्तियों को शरीर व मस्तिष्क की पारिवारिक विरासत के रूप में स्वीकार कर लिया और यह मान ही लिया था कि डीएनए ही निर्धारित करेगा कि हम किस तरीके का व्यवहार करेंगे, या फिर किस तरीके के रोगों के शिकार होंगे| इसी अवधारणा के कारण इधर हम ध्यान से दूर होते चले गए और अपने आप को असहाय महसूस करने लगे और उधर सिर्फ और सिर्फ चिकित्सा विज्ञान की गुलामी को स्वीएकर करते गए| शरीर हमारे जीवन की धुरी बन गया और मन एक अनियंत्रित-आत्मघाती-दानव|
हम काफी खुशकिस्मत हैं कि इस धरती पर सिर्फ और सिर्फ भारतीयों की वर्तमान आलसी पीढ़ी नहीं बसती बल्कि कुछ खोजी किस्म के जुझारू प्राणी, मानव रूप में किन्ही और महाद्वीपों पर विद्यमान हैं| हमने अपनी आध्यात्मिक ज्ञान की विरासत का मुरब्बा बना कर अपने पुस्तकालयों के मर्तबानो में भर कर रख दिया और उसे बिना खाए ही, बिना चखे ही अपने सम्पूर्ण आध्यात्मिक विकास की उम्मीद लगाये बैठे रहे पर पश्चिम का वैज्ञानिक अब भी खोज रहा था| पर ऐसा क्यूँ हुआ? वास्तव में हमें मानसिक रूप से अपने अमीर होने का भान होता है, क्यूँ कि अगर कोई कहे कि “आत्मा…” तो आप उसे आधे घंटे का प्रवचन दे सकते हैं| कोई अगर गलती से भी “कर्म” का नाम ले दे तो आप उसे पूरा “गीता-सार” सुना सकते हैं.. धन्य हैं हमारे पूर्वज जो हमे सब कुछ दे गए जो भी हमें मालूम हो सकता था पर उन्हें या नहीं मालूम था कि किसी परम भक्त द्वारा भक्ति व समर्पण की पराकाष्ठा में किये गए उदगार “होइहै वही जो राम रची राखा”  ही तुम्हारे जीवन का दर्शन बन जाएगा और फिर सब कुछ सिर्फ “पढने और जानने” तक सीमित हो कर रह जायेगा, करने को कुछ बचेगा ही नहीं | तो हुआ वही… जो राम ने रचा था, लोगों ने गीता और रामायण व तमाम उपनिषदों के सार के मिश्रण से एक विचित्र रस का उद्भव किया और अपने जीवन का सम्पूर्ण दर्शन ही बदल डाला और उस रस के पान से हमने अपने पुरातन ज्ञान को तो भुला ही दिया और भविष्य की सारी चिंताएं, सारी खोजें भी अकर्मण्यता के समुन्दर में डुबो कर किनारे पर बैठ कर भजन करने लगे| अपने को आध्यात्मिक-अमीर समझने का यह हश्र हुआ कि हम दुनिया के गरीब देशों की मेरिट लिस्ट में शामिल हो गए |

पश्चिम का हाल भी कुछ अलग नहीं रहा पर सिर्फ एक बात अलग थी बस.. वो काफी लम्बे अरसे तक आलसीपन से दूर रहे | भौतिक जगत में.. पांच इन्द्रियों के दायरे में आने वाले हर रहस्यों को जानने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया | भौतिक विज्ञान गलत नहीं था.. न ही उन मनीषियों के ज्ञान में कोई अशुद्धि जिन्हों ने विज्ञान को भौतिक जगत की उन सीमाओं तक पहुंचा दिया जहां से आध्यात्मिकता की यात्रा शुरू हो सकती थी | पर शक्ति गलत हाथों में पड़ जाए तो सिर्फ हिरोशिमा-नागासाकी ही हो सकता है – और हुआ भी वही | मनुष्य के शरीर, मन व जीवन को समझने में भी बहुत परिश्रम किया गया वहां | पश्चिम के चिकित्सा विज्ञानियों ने शरीर की काफी चीरफाड़ की पर इन सबके बाद भी इसके गहन रहस्यों के बारे में अपने आप को अन्धकार में ही पाया| जब पश्चिम अपनी डीएनए की खोज व समस्त जैविकी के अनुसंधानों से भी बहुत सारे महत्वपूर्ण सवालों के उत्तर नहीं पा सका तब एक नयी दिशा से खोज प्रारम्भ हुई| मनो-वैज्ञानिकों के अनुभवो,  भौतिकी के नए नियमो की खोजों और भारतवर्ष से भ्रमण पर निकले कई योगियों व मनीषियों के ज्ञान के सम्मिश्रित अवघूर्णन से, मंथन से जो नई समझ पैदा हुई उससे पिछली शताब्दी के अंत आते आते तक एक बात साफ़ होने लगी कि भारतीय मनीषियों के दिए हुए नियम पूर्णतया सही हैं| मानव शरीर वहीँ पर ख़त्म नहीं होता जहां तक दीखता है – इस स्थूल शरीर के अन्दर भी और कई शरीर छुपे हो सकते हैं ऐसा दबी जुबान से स्वीकार किया जाने लगा |

फिर क्या था , एक के बाद एक नए नियमो की खोज होने लगी – किसी ने कहा हम अपने मन के सहारे अपने सारे सपनो को पूरा कर सकते हैं | किसी ने कहा आप अपने डी एन ए बदल सकते हैं | किसी ने कहा उसका संपर्क सीधे ऐसे अदृश्य शक्तियों से हो गया है जो आने वाले समय में होने वाली सभी मुश्किलों का रास्ता दे सकता है | तभी किसी ने कहा की उन्हों ने तो अल्टीमेट नियम खोज लिया है सृष्टि का – उसे उन्हों ने नाम दिया “Law of attraction”| अब तक पश्चिम में भी अकर्मण्यता के बीज पहुँच चुके थे आखिरकार ३०० वर्षों की तकनीकी सुख सुविधाओं ने भी उनके स्वभाव पर गहरा प्रभाव डाला था.. तो ऐसे नियमो की खोज कोई अचम्भा नहीं थी | आखिर कौन नहीं चाहता कि सब कुछ बैठे-२ हो जाए – कल्पना मात्र से | कृष्ण का कर्म-फल का सिद्धांत, कुछ कृष्ण-ह्रदय व्यापारी-प्रवृत्ति के पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों ने चकनाचूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी – मेरे देखे “Law of attraction” तो अकर्म-फल का सिद्धांत ही है – कर्मफल का अधूरा, मरोड़ा हुआ सिद्धांत जो ये कहता है कि सिर्फ मानसिक कर्म ही पर्याप्त है | आप उतना ही कीजिये और बाकी सृष्टि (Universe) पर छोड़ दीजिये.. उनका कहना है कि सृष्टि गुलामो की तरह से आप की कल्पनाओं की सेवा में लग जायेगी , आप सिर्फ खुश रह कर अच्छे सपने देखना और इंतज़ार भर करना सीख लीजिये|

मन यही चाहता है – उन्मुक्त उड़ान और शरीर सिर्फ आराम | मन स्थिर नहीं रहना चाहता और शरीर हिलना नहीं चाहता | भारतीय मनीषियों ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया था.. और वो भी लाखों वर्ष पहले| इसीलिए उन्हों ने शरीर को सेवा-तप से और मन को धारणा और ध्यान से शुद्ध करने की प्रक्रिया समझाई थी | आज भी वो उतनी ही कारगर है – अगर मन और शरीर के सामंजस्य को बनाए रखना है तो आज के मनुष्य को ये दो काम करने ही होंगे – मन को स्थिर करना और शरीर को दूसरों के हित में कर्म-संलग्न| जब आप इस स्थिति में अपने आप को लाते हैं तभी इस तुला के.. तराजू के दो पलड़ों में संतुलन उत्पन्न होता है और आप की प्रज्ञा को अपने केंद्र, जो गति और स्थिति से परे है होने का भान होता है | जब आप अपने आपको सेवा और तप में झोंक देते हैं तब आप के अन्दर एक नई समझ पैदा होती है – और वो यह है की यह शरीर आप नहीं हैं और न ही दूसरा व्यक्ति | मन के स्थिर होने से यह पता लगने की उम्मीद बन जाती है कि आप अपनी उद्विग्नता के सही और मूल कारण को पकड़ पाएं| मन और शरीर का उपयोग कीजिये… पर-हित में… तभी यह संभव है |

मन को नियंत्रित करने के लिए हमें अपने पञ्च-कोशों के आवरण को समझना जरूरी है – पञ्च-कोशों में मनोमय-कोष बिलकुल बीच में, मध्य में है.. एक तरफ से आप के संग्रहीत संस्कारों के झोंके इसमें तरंगें पैदा करते हैं दूसरी ओर से अन्नमयकोश की पांच ज्ञानेन्द्रियों से आई हुई ऊर्जाओं के विस्फोटक हमले जो आपके प्राणमय कोष के अन्दर स्थिरता आने नहीं देते | मन को नियंत्रित करने का सारा प्रयास इसीलिए नहीं सफल होता क्यूँकि स्थूल शरीर में इतने व्यवधान पैदा हो चुके हैं.. लगातार हलचल मची हुई है – इसमें विद्यमान तत्वों की ऊर्जाओं में असंतुलन बना हुआ है| अब ये तो वही बात हुई कि आप के पडोसी के घर में जोर-जोर से नगाड़े बजाये जाएँ और आप से कहा जाए कि गहरी नीद सोइए| संभव नहीं है यह – आप को पड़ोसियों से बात करनी होगी.. नगाड़ों का शोर ख़त्म करवाना होगा| येही बात आप के मन पर भी लागू होती है – आप के पञ्च-तत्त्व-युक्त शरीर के तत्वों में ऊर्जाओं के पहले संतुलन में लाना होगा| फिर पहले से ही झनझनाते हुए ऊर्जावान शरीर या प्राणमय कोष के आंदोलित केन्द्रों को शांत करना होगा तभी आप अपने मन के इस अनियंत्रित व्यवहार को बलाद सकते है | वास्तविक ध्यान.. पर्याप्त लम्बी धारणा की परिणित है – और धारणा ऐसी होती है जैसे तेल कि अविरल – धार, सुस्थिर.. बिना किसी हलचल के.. बिना किसी आवाज के.. लगातार.. निरंतर.. बहाव…

मन को पकड़ने के कई उपाय बताये गए है – श्वास को देखना, काल्पनिक लोकों का भ्रमण करना, बहुत सारी उछल-कूद करके अचानक शांत हो जाना, त्राटक इत्यादि | पर मेरे देखे यह सभी ज़्यादातर लोगों में कारगर नहीं साबित होते | लोगों को थोड़ी बहुत विश्रांति जरूर अनुभव होती है पर गहरा रूपांतरण पर शुद्ध धारणा तक कोई कोई ही पहुँच पाता है | मै जिस विधा का उपयोग करता हूँ उसे मै “ताओ ऑफ़ क्रियेशन” या सृजन का महाविज्ञान कहता हूँ और यह पहले ही तल पर मन के नियंत्रण को सहज ही संभव करती है | ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्यूँकि इस विधा में हम शरीर और मन के बीच के तारों का पूरी तरह से उपयोग करते हैं |  “तत्व शक्ति विज्ञान” इस वैज्ञानिक प्रक्रिया का पहला प्रकरण है | इसमें आप को अपने शरीर के तत्वों के संतुलन को बनाने के लिए विशेष प्रयोग दिए जाते हैं – आप के किस तत्त्व के असंतुलन से आप के मन व शरीर में अशांति है यह पहचानना सिखाया जाता है | गुरुमंडल से प्राप्त एक विशेष चाभी आप को दी जाती है | इसी चाभी से आप को अपने पहले तल के सारे ताले खोलने की तकनीक सिखाई जाती है | एक बार इस प्रक्रिया से आप पूर्णतया परिचित हो जाते हैं तो फिर धीरे-धीरे मन तक पहुँच आसान हो जाती है – मन पकड़ में आने लगता है |

–  आचार्य अज्ञातदर्शन आनंद नाथ

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