Preparing for Enlightenment in Vaishakh month – Happy Buddha Poornima

॥ ऋतुचक्र और आध्यात्मिक प्रगति ॥
॥ ऋतुचक्र और आध्यात्मिक प्रगति ॥
                                                                                                   (बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष)

वास्तव में इस ऋतु-चक्र जो कि सूर्य की आकाशीय गति पर आधारित है. के अनुसार ही हमारी साधनाओं का फल भी हमें मिलता है। आश्चर्य होगा यह जानकर कि आत्म-उत्थान व परमात्म-साक्षात्कार में भी ऋतुएँ अपने चक्र का प्रभाव डालती है । ग्रीष्म ऋतु इसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है । चैत्र मास से ही वातावरण में ऊष्मा परिलक्षित होने लगती है और लगभग आषाढ़ के मध्य तक ग्रीष्म ऋतु चलती है । वैशाख मास जिसमे ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर होती है का आध्यात्म-साधकों के लिए बहुत ही महत्व है । पर कैसे?

इस ब्रह्माण्ड मे वर्तुलाकार गति सर्वत्र व्याप्त है । समस्त आकाशीय पिण्ड, आकाश-गंगा, मन्दाकिनियाँ, ग्रह-नक्षत्र, परमाणवीय कण, काल-चक्र, सृष्टि सृजन , जीवन-मृत्यु, दिन-रात, सभी लौकिक परिवर्तन इसी चक्र के अंतर्गत हैं । जिस किसी भी शक्ति ने इस जगत को बनाया है मेरे देखे वर्तुल गति को उस महाशक्ति के हस्ताक्षर कहना गलत नहीं होगा । क्यूंकि जिधर तक भी हम मनुष्यों की दृष्टि या सोच जा सकती है, यहां तक कि अनंतता में भी हमें वर्तुल ही दृष्टिगोचर होता है। वर्तुल एक ऐसा आयोजन है जिसके आदि या अंत की कोई संभावना नहीं होती और अब तो वैज्ञानिक भी इस बात को मानने लगे हैं कि मनुष्यता कभी भी उस स्तर पर नहीं पहुँच सकेगी जब वो इस कार्य-कारण-रूपा जगत के अनादि-अनन्त वर्तुल का मूल कारण को डिकोड कर सके। हाँ , पर वे यह दावे के साथ कहते हैं कि इस आदि-अंतहीन वर्तुलाकार ब्रह्माण्डीय नृत्य के नियमों की यदि हमें सीमित जानकारी भी मिलती रहे तो हम मनुष्य अपने विकास-क्रम को जारी रख सकते है। ये बात सच भी है – आज तक मनुष्यता का सारा विकास प्रकृति की गति के साथ सामंजस्य बिठा कर ही हुआ है।

मनुष्यता के शुरूआती दिनों में जैसे ही ऋतुओं के चक्र का ज्ञान हुआ – अपनी सबसे पहली जरूरत ‘भोजन’ को पूरा करने के लिए उसने कृषि सम्बन्धी समस्त कार्य को ऋतुओं के चक्र के साथ जोड़ा। मनुष्यों ने देखा कि कुछ बीज सिर्फ कुछ विशेष ऋतुओं में ही प्रमुखता से फल देते हैं.. और उन प्रारम्भिक इतिहास के गुमनाम वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि यदि वे बीज को किसी अलग मौसम में फल देने के लिए बाध्य करें तो पैदावार कम हो जाती है। इसलिए नियम बना दिए गए – उनका पालन होने लगा और भोजन की भरपूर आपूर्ति भी। प्रकृति के नियम इतने पक्के हैं कि उन नियमो के विरुद्ध जा कर हम आज तक कृषि नहीं कर सके। धीरे-धीरे एक बात साफ़ होने लगी है कि मनुष्य को प्रकृति के नियमों के साथ चलना होगा – क्यूंकि उसकी सामर्थ्य नहीं की प्रकृति के नियमों को बदल सके। हमें सूर्य के चक्र के साथ जीवन को जोड़ना ही पढ़ेगा।

जहां एक ओर कृषि, यांत्रिकी, रसायन, भौतिकी, ओषध आदि लौकिक विज्ञान का विकास हो रहा था वहीँ दूसरी और कुछ आध्यात्मिक वैज्ञानिक ‘स्वयं’ की खोज में लगे हुए थे । पृथ्वी पर सभी ऋषि, मुनि अपनी-अपनी विधा से इस परम-शक्ति की खोज के का उपाय कर रहे थे। ध्यान, मंत्र, योग, तंत्र, अनुष्ठान, प्राणायाम आदि साधन उसी समय की सफल खोजें है जिन्हे आज भी मानवजाति अपनी शांति, स्वास्थ्य व पारलौकिक कल्याण के लिए उपयोग में ले रही है । ये खोजें वास्तव में असाधारण हैं क्यूंकि इनके प्रयोग से मनुष्य मात्र न केवल अपने भीतर की शक्तियों को जागृत कर सकता है बल्कि ब्रह्माण्ड के परम रहस्यों से भी परिचित होता है। यदि आज हम ऋषि-मुनियों द्वारा खोजी गई इन विधाओं का, साधनो का अपने जीवन में सफलता से उपयोग करना चाहते हैं तो हमें इन मनीषियों द्वारा बताये गए नियमो पर व इंगित सम्भावनाओ को भी गंभीरता से लेना होगा ।

पुरातन आध्यात्मिक वैज्ञानिकों ने साधनाओं पर ऋतुओं के प्रभाव का अध्ययन किया और उन्होंने पाया की न केवल मनुष्य का जीवन, उसका पोषण, विकास आदि ऋतु-चक्र व सूर्य कि वर्तुलाकार गति से जुड़े हुए हैं, बल्कि उनकी साधनायें भी। उदाहरण के तौर पर यह एक विचार प्रचलित है कि सूर्य के उत्तरायण रहने पर यदि मनुष्य शरीर छोड़ता है तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है । सूर्य की उत्तरायण गति सर्व-सम्मति से २१ दिसंबर से शुरू हो कर २० जून तक मानी जाती है। हालांकि दक्षिण भारत के कुछ विद्वान इसे १४ जनवरी से – १३ जुलाई तक भी मानते हैं । चाहे किसी भी मत से हम इस बात को समझें – ग्रीष्म ऋतु जो कि उत्तरायण का मध्य है हमारी आध्यात्मिक चेतना के उत्थान का विशेष काल दर्शाता है । यह कोरी कल्पना नहीं है – मेरा अपना अनुभव व खोज भी इसी तथ्य की ओर इंगित करती है कि ग्रीष्म ऋतु ही, विशेष रूप से चैत्र से ले कर आषाढ़ तक (वैशाख माह मुख्यता से चूंकि यह मध्य का प्रबल समय है ) वह काल है जब हमारी साधनाओ का फल हमें प्राप्त होने की सबसे ज्यादा संभावना होती है। इस युग के तीन सबसे प्रबल आध्यात्मिक व्यक्तित्वों भगवान महावीर (जैन धर्म), गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म) व गुरु नानक देव (सिख धर्म) के जीवन का अध्ययन यदि आप करें तो भी यही बात सिद्ध होगी ।

महात्मा बुद्ध को ज्ञान वैशाख की पूर्णिमा को प्राप्त हुआ था, चौबीसवें जैन तीर्थंकर स्वामी महावीर को आत्म-साक्षात्कार अनुभव बयालीस वर्ष की अवस्था में वैशाख के महीने में ही हुआ था । नानक देव जी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्हें ३० वर्ष के अवस्था में एक तालाब में स्नान करते समय समाधि लगी जो की तीन दिनों तक लगी रही और वही समय था जब उन्हें परम-तत्व के दर्शन हुए। हालांकि इतिहास में उनके जीवन के इस विशेष दिन की तिथि का वर्णन नहीं मिलता परन्तु नानक के जन्म की तिथि १४ या १५ अप्रैल १४६९ जरूर मान्य है । इस तथ्य को ध्यान रख कर यदि इस तथ्य कि ‘नानक देव जी को ३० वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त हुआ’ को देखें तो उनकी समाधि प्राप्त होने की तिथि इसी वैशाख मास में ही पड़नी चाहिए।

कुछ न कुछ कारण अवश्य है कि वैशाख मास को हिन्दू धर्मग्रंथों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ। यह एक संयोग मात्र नहीं है कि आध्यत्मिक चेंतना के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने वाले मनुष्यों को ज्ञान ग्रीष्म-ऋतु में विशेषकर वैशाख में यह योग प्राप्त हुआ – इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। पहला कारण यह की सूर्य पृथ्वी के सबसे करीब होता है और उसके गुरुत्वाकर्षण व अन्य आध्यात्मिक बलों का प्रभाव हमारे ऊपर सर्वाधिक होता है अतः मनुष्य चेतना के ऊर्ध्वीकरण की सम्भावनाये सर्वोच्च होती है ।

‘तत्वशक्ति विज्ञान’ के सिद्धांतो के अनुसार भी ग्रीष्मऋतु साधना मे तीव्रता लाने व साधनाफल की प्राप्ति कराने वाली है । इसका कारण यह है कि गर्मियों में ‘जल तत्व’ की गति ऊर्ध्व अर्थात ‘पृथ्वी तत्व’ से ‘आकाश तत्व’ की और हो जाती है । ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्मांडे’ के सिद्धांत के अनुसार इस ऋतु में हमारे शरीर में भी विद्यमान ‘जल तत्व’ में सहज ही ऊर्ध्व गति होती है । यह तथ्य एक वैज्ञानिक सत्य है कि जल तत्व ही हमारे शरीर में ‘रस व प्राण ऊर्जा के संवाहक’ का कार्य भी करता हैं । विश्व की सभी आध्यात्मिक विधाओं के साधक-साधिकाएं साधनकाल में अपने वीर्य-रज का रक्षण करते हैं और इस रक्षण से उत्पन्न हुए ‘ओज या बिंदु’ को मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र की ओर प्रवाहित करने की विशेष क्रियाओं को करते है। यह बात सर्व विदित है कि ‘ओजस’ के सहस्रार में प्रवाहित होने पर ही मनुष्य परमशक्ति के संपर्क में आ सकता है। ग्रीष्मऋतु में ‘जल तत्व’ ऊर्जाओं में सहज ऊर्ध्वगति तथा इसकी रास संवाहक प्रकृति उन्हें उनके प्रयासों में उत्प्रेरक का कार्य करती है और चेतना सरलता से ऊर्ध्वगामी होकर उन्हें उस परमशक्ति के संपर्क में ला देती है।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भी वैशाख मास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु है और वे स्वयं जल तत्व में शेषनाग की शय्या पर विराजमान दिखाए जाते हैं। यह सिर्फ एक संकेत है की साधक वैशाख माह में यदि साधक जल तत्व की शक्तियों का उपयोग सही विधि से करे तो सफलता निश्चित है। तत्व शक्ति विज्ञान के सभी साधकों को आज के दिन का विशेष उपयोग करना चाहिए – अपनी ऊर्जाओं के ऊर्ध्वं गमन की सँकल्प के साथ गुरुमण्डल की पवित्र शक्तियों के सहयोग से अपनी साधना मे तीव्रता का संचार करना चाहिए ।

आप सभी को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ की शुभकामनाये ।

शिवोहम!

– आचार्य अज्ञातदर्शन आनंद नाथ

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